مازن شديد

(1)

أدقُّ في الليل بابي....

كي أفتحَ لي..

لأنامَ من تعبي،.

ما بين أحبابي...

أدقّهُ طويلاً ،.

وأنتظرْ........!

لكنني.........

لم أجدني خلف باب البيتْ....!

كي أفتحَ لي...

وأنتهي ،.

من غُربتي وعذابي.......!!

(2)

وانتظرتُ..وانتظرتْ....

بعدها ذهبتْ...

وما عرفتُ أينْ غبتْ..!

شعرتُ أنني كأنني ،.

كائنٌ ليس لهُ وجودْ،.

في هذا الوجودْ.......!!

(3)

قرّرتُ بعدها أعودُ لي...

مع حزني الذي،.

يحتلُّني تماماً،.

أينما إتّجهتْ...

في حياتي َ التي ،.

بدأتُ فيها رحلتي التي ،.

كُتِبتْ عليّْ..

كي أعيشَ مثل أيّ شيء،.

وأكتمِلْ.........!

ووجدتُ نفسي فجأة ،.

كائناً مقيّداً.....

من غير ظِلْ........!!

يحُدّني من اليمين القهرْ..

ومن اليسار الجمرْ....

وغيومُ خيبتي فوقي..

تغمرني بأكملي ،.

بأمطارٍمن الأسى والخوفْ...

وأُحسُّ فوق عنقي ،.

أينما إتّجهتُ سيفْ....!